Brihaspati Chalisa
Opening
Doha 1
गाऊँ नित मंगलाचरण, गणपति मेरे नाथ। करो कृपा माँ शारदा, जीव रहें मेरे साथ॥
Doha 2
अज्ञानी मति मंद मैं, हैं गुरुस्वामी सुजान। दोषों से मैं भरा हुआ, तुम हो कृपा निधान॥
Chaupai
Chaupai 1
वीर देव भक्तन हितकारी। सुर नर मुनिजन के उद्धारी॥
Chaupai 2
वाचस्पति सुर गुरु पुरोहित। कमलासन बृहस्पति विराजित॥
Chaupai 3
स्वर्ण दंड वर मुद्रा धारी। पात्र माल शोभित भुज चारी॥
Chaupai 4
है स्वर्णिम आवास तुम्हारा। पीत वदन देवों में न्यारा॥
Chaupai 5
स्वर्णारथ प्रभु अति ही सुखकर। पाण्डुर वर्ण अश्व चले जुतकर॥
Chaupai 6
स्वर्ण मुकुट पीताम्बर धारी। अंगिरा नन्दन गगन विहारी॥
Chaupai 7
अज अगम्य अविनाशी स्वामी। अनन्त वरिष्ठ सर्वज्ञ नामी॥
Chaupai 8
श्रीमत् धर्म रूप धन दाता। शरणागत सर्वापद् त्राता॥
Chaupai 9
पुष्य नाथ ब्रह्म विद्या विशारद। गुण बरने सुर गण मुनि नारद॥
Chaupai 10
कठिन तप प्रभास में कीन्हा। शंकर प्रसन्न हो वर दीन्हा॥
Chaupai 11
देव गुरु ग्रह पति कहाओ। निर्मल मति वाचस्पति पाओ॥
Chaupai 12
असुर बने सुर यज्ञ विनाशक। करें सुरक्षित मन्त्र से सुर मख॥
Chaupai 13
बनकर देवों के उपकारी। दैत्य विनाशे विघ्न निवारी॥
Chaupai 14
बृहस्पति धनु मीन के नायक। लोक द्विज नय बुद्धि प्रदायक॥
Chaupai 15
मावस वीर वार व्रत धारे। आश्रय दें सर्व पाप निवारें॥
Chaupai 16
पीताम्बर हल्दी पीला अन्न। शक्कर मधु पुखराज भू-लवण॥
Chaupai 17
पुस्तक स्वर्ण अश्व दान कर। दे देवें जीव अनेक सुखद वर॥
Chaupai 18
विद्या सिन्धु स्वयं कहलाते। भक्तों को सन्मार्ग चलाते॥
Chaupai 19
इन्द्र किया अपमान अकारण। विश्वरूपा गुरु किये धारण॥
Chaupai 20
बढ़ा कष्ट सब राज गँवाया। दानव ध्वज स्वर्ग लहराया॥
Chaupai 21
क्षमा माँग फिर स्तुति कीन्ही। विपदा सकल जीव हर लीन्ही॥
Chaupai 22
बढ़ा देवों में मान तुम्हारा। कीरति गावें सकल संसारा॥
Chaupai 23
दोष बिसार शरण में लीजै। उर आनन्द प्रभु भर दीजै॥
Chaupai 24
सद्गुरु तेरी प्रबल माया। तेरा पारा ना कोई पाया॥
Chaupai 25
सब तीर्थ गुरु चरण समाये। समझे विरला बहु सुख पाये॥
Chaupai 26
अमृत वारिद सदृश वाणी। हिरदय धार भये ब्रह्मज्ञानी॥
Chaupai 27
शोभा मुख से बरनि न जाई। देवें भक्ति जीव मनचाही॥
Chaupai 28
जो अनाथ ना कोइ सहाई। लख चौरासी पार कराहीं॥
Chaupai 29
प्रथम गुरु का पूजन कीजे। गुरु चरणामृत रुच-रुच पीजे॥
Chaupai 30
मृग तृष्णा गुरु दर्शन राखी। मिले मुक्ति हो सब जग साखी॥
Chaupai 31
चरणन रज सद्गुरु सिर धारे। पा गये दास पदारथ सारे॥
Chaupai 32
जग के कार विहारण दोड़े। गुरु मोह के बन्धन तोड़े॥
Chaupai 33
पारस माणिक नीलम रत्ना। गुरुवर सम्मुख व्यर्थ कल्पना॥
Chaupai 34
कर निष्काम भक्ति गुरुवर की। सुन्दर छवि धारे सुखकर की॥
Chaupai 35
गुरु पताका जो फहराएँ। मन क्रम वचन ध्यान से ध्यावें॥
Chaupai 36
काल रूप यम नहीं सतावें। निश्चय गुरुवर पिंड छुड़ावें॥
Chaupai 37
भूत पिशाच निकट ना आवें। रोगी रोग मुक्त हो जावें॥
Chaupai 38
संतति हीन संस्तुति गावें। मंगल होय पुत्र-धन पावें॥
Chaupai 39
जो नर गुण गा हिरदय हर्षावे। स्नेह जीव चरणों में लावे॥
Chaupai 40
जीव चालीसा पढ़े पढ़ावे। पूर्ण शांति को पल में पावें॥
Closing
Doha 1
मात पिता के संग मनु, गुरु चरण में लीन। किरपा सब पर कीजिये, जान जगत में दीन॥
Doha 2
बृहस्पति चालीसा जो पढ़े, भक्ति भाव मन लाय। ज्ञान धर्म धन यश मिले, सब दुःख दूर हो जाय॥