Mahakali Chalisa
Opening
Doha 1
जय जय सीताराम के, मध्यवासिनी अम्ब। देहु दर्श जगदम्ब, अब करो न मातु विलम्ब॥
Doha 2
जय तारा जय कालिका, जय दश विद्या वृन्द। काली चालीसा रचत, एक सिद्धि कवि हिन्द॥
Doha 3
प्रातः काल उठ जो पढ़े, दुपहरिया या शाम। दुःख दरिद्रता दूर हों, सिद्धि होय सब काम॥
Chaupai
Chaupai 1
जय काली कंकाल मालिनी। जय मंगला महा कपालिनी॥
Chaupai 2
रक्तबीज बधकारिणि माता। सदा भक्त जननकी सुखदाता॥
Chaupai 3
शिरो मालिका भूषित अंगे। जय काली जय मद्य मतंगे॥
Chaupai 4
हर हृदयारविन्द सुविलासिनि। जय जगदम्बा सकल दुःख नाशिनि॥
Chaupai 5
ह्रीं काली श्री महाकाली। क्रीं कल्याणी दक्षिणाकाली॥
Chaupai 6
जय कलावती जय विद्यावती। जय तारा सुन्दरी महामति॥
Chaupai 7
देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट। होहु भक्त के आगे परगट॥
Chaupai 8
जय ॐ कारे जय हुंकारे। महा शक्ति जय अपरम्पारे॥
Chaupai 9
कमला कलियुग दर्प विनाशिनी। सदा भक्त जन के भयनाशिनी॥
Chaupai 10
अब जगदम्ब न देर लगावहु। दुख दरिद्रता मोर हटावहु॥
Chaupai 11
जयति कराल कालिका माता। कालानल समान द्युतिगाता॥
Chaupai 12
जयशंकरी सुरेशि सनातनि। कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनि॥
Chaupai 13
कपर्दिनी कलि कल्प बिमोचनि। जय विकसित नव नलिनविलोचनि॥
Chaupai 14
आनन्द करणि आनन्द निधाना। देहुमातु मोहि निर्मल ज्ञाना॥
Chaupai 15
करुणामृत सागर कृपामयी। होहु दुष्ट जनपर अब निर्दयी॥
Chaupai 16
सकल जीव तोहि परम पियारा। सकल विश्व तोरे आधारा॥
Chaupai 17
प्रलय काल में नर्तन कारिणि। जय जननी सब जग की पालनि॥
Chaupai 18
महोदरी महेश्वरी माया। हिमगिरि सुता विश्व की छाया॥
Chaupai 19
स्वछन्द रद मारद धुनि माही। गर्जत तुम्ही और कोउ नाही॥
Chaupai 20
स्फुरति मणिगणाकार प्रताने। तारागण तू ब्योम विताने॥
Chaupai 21
श्री धारे सन्तन हितकारिणी। अग्नि पाणि अति दुष्ट विदारिणि॥
Chaupai 22
धूम्र विलोचनि प्राण विमोचनि। शुम्भ निशुम्भ मथनि वरलोचनि॥
Chaupai 23
सहस भुजी सरोरुह मालिनी। चामुण्डे मरघट की वासिनी॥
Chaupai 24
खप्पर मध्य सुशोणित साजी। मारेहु माँ महिषासुर पाजी॥
Chaupai 25
अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका। सब एके तुम आदि कालिका॥
Chaupai 26
अजा एकरूपा बहुरूपा। अकथ चरित्र तव शक्ति अनूपा॥
Chaupai 27
कलकत्ता के दक्षिण द्वारे। मूरति तोर महेशि अपारे॥
Chaupai 28
कादम्बरी पानरत श्यामा। जय मातंगी काम के धामा॥
Chaupai 29
कमलासन वासिनी कमलायनि। जय श्यामा जय जय श्यामायनि॥
Chaupai 30
मातंगी जय जयति प्रकृति हे। जयति भक्ति उर कुमति सुमति है॥
Chaupai 31
कोटिब्रह्म शिव विष्णु कामदा। जयति अहिंसा धर्म जन्मदा॥
Chaupai 32
जल थल नभमण्डल में व्यापिनी। सौदामिनि मध्य अलापिनि॥
Chaupai 33
झननन तच्छु मरिरिन नादिनि। जय सरस्वती वीणा वादिनी॥
Chaupai 34
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा॥
Chaupai 35
जय ब्रह्माण्ड सिद्धि कवि माता। कामाख्या और काली माता॥
Chaupai 36
हिंगलाज विन्ध्याचल वासिनी। अट्टहासिनी अरु अघन नाशिनी॥
Chaupai 37
कितनी स्तुति करूँ अखण्डे। तू ब्रह्माण्डे शक्तिजितचण्डे॥
Chaupai 38
करहु कृपा सबपे जगदम्बा। रहहिं निशंक तोर अवलम्बा॥
Chaupai 39
चतुर्भुजी काली तुम श्यामा। रूप तुम्हार महा अभिरामा॥
Chaupai 40
खड्ग और खप्पर कर सोहत। सुर नर मुनि सबको मन मोहत॥
Chaupai 41
तुम्हरि कृपा पावे जो कोई। रोग शोक नहिं ताकहँ होई॥
Chaupai 42
जो यह पाठ करे चालीसा। तापर कृपा करहि गौरीशा॥
Closing
Doha
जय कपालिनी जय शिवा, जय जय जय जगदम्ब। सदा भक्तजन केरि दुःख हरहु, मातु अवलम्ब॥