Kartikeya Chalisa
Opening
Doha
जय जय सब देवन के देवा, करें सदा तुम्हरे पद सेवा। तुम हो जगत के पालनकर्ता, भक्तों के हो तुम दुःखहर्ता॥
Chaupai
Chaupai 1
जयति जयति श्री स्कन्द कुमारा, स्वामी कार्तिकेय अगम अपारा॥
Chaupai 2
शिव सुत, उमा लाल, षडानन, सनमुख, शूलपाणि, शरजनन॥
Chaupai 3
गौरी प्रिय, गंगा के नंदन, कलि-कलुष, दुःख, दारिद्रय निकंदन॥
Chaupai 4
देवों के सेनापति स्वामी, तारकासुर के अरि, नमामि॥
Chaupai 5
कृत्तिकाओं के तुम सुत कहलाये, इसीसे कार्तिकेय कहाये॥
Chaupai 6
रूप अनुपम, गुणगान वरिष्ठा, छः मुख सोहत, अंग सुनिष्ठा॥
Chaupai 7
मोर सवारी, शस्त्र कराला, भक्त हेतु तुम हो प्रतिपाला॥
Chaupai 8
ब्रह्मचारी, व्रतधारी स्वामी, परम तपस्वी, अन्तर्यामी॥
Chaupai 9
देवन के दुःखहर्ता देवा, करते सुर-नर-मुनि सब सेवा॥
Chaupai 10
तारक ने जब त्रास मचाया, स्वर्गलोक पर चँवर ढुलाया॥
Chaupai 11
देवगण सब भए दुखारी, भागे-भागे शरण तुम्हारी॥
Chaupai 12
तब तुमने निज शक्ति दिखाई, तारक का वध तुरत मचाई॥
Chaupai 13
षण्मुख कहकर मात पुकारा, तब उमा ने हृदय लगाया॥
Chaupai 14
नाम तुम्हारा है शरवणभव, भवसागर के तुम हो उद्भव॥
Chaupai 15
गजानन के भ्राता प्यारे, भक्तों के तुम हो रखवारे॥
Chaupai 16
कुमार, गुह, गंगासुत देवा, तुम ही हो शिव-पार्वती सेवा॥
Chaupai 17
तेज तुम्हारा है अति भारी, असुर-दल काँपे थरथारी॥
Chaupai 18
रोग-दोष, अरु दारिद्र सारा, भक्त-जनों का हरते भारा॥
Chaupai 19
जो कोई तुमको मन से ध्यावे, वह मनवांछित फल को पावे॥
Chaupai 20
जो नर जपता नाम तुम्हारा, हो जाता भवसागर पारा॥
Chaupai 21
शत्रु-भय से जो है व्याकुल, नाम जपे, होए भय निर्मूल॥
Chaupai 22
जो हैं निर्धन, दीन-दुखारी, तुम करते उनकी प्रतिपाली॥
Chaupai 23
पुत्र-हीन जो तुमको ध्यावे, निश्चय ही वह पुत्र को पावे॥
Chaupai 24
भूत-प्रेत अरु दुष्ट पिशाचा, नाम सुने भागे सब साचा॥
Chaupai 25
जो नर पढ़ता यह चालीसा, उसपर कृपा करें गौरीसा॥
Chaupai 26
प्रतिदिन इसे जो मन लाए पढ़ेगा, उसका सब दुःख दूर हटेगा॥
Chaupai 27
ज्ञान-बुद्धि अरु बल बढ़ जावे, घर में सुख-समृद्धि आवे॥
Chaupai 28
कार्तिक मास जो पाठ करावे, सब संकट से तुरत बचावे॥
Chaupai 29
जो यह सुने भक्ति चित लाई, ताको मिले सकल सुखराई॥
Chaupai 30
स्वामी शक्ति-धर, गणनायक, तुम हो मेरे सदा सहायक॥
Chaupai 31
मैं हूँ दीन, मलीन, दुखारी, हर लो मेरी विपत्ति सारी॥
Chaupai 32
हे जगपालक, हे जगवंदन, करूँ मैं नित्य तुम्हारा वंदन॥
Chaupai 33
मुझपर कृपा करो, शरणागत, तुम बिन कोई नहीं मेरा हित॥
Chaupai 34
मैं हूँ शरण तुम्हारी देवा, स्वीकार करो यह मेरी सेवा॥
Chaupai 35
हे षडानन, हे शिवनंदन, मेटो मेरे दुःख के बंधन॥
Chaupai 36
जय जय जय स्वामी कार्तिकेय, हर-हर-हर-हर उमा के प्रिय॥
Closing
Doha
यह कार्तिकेय चालीसा, पढ़े जो श्रद्धावान। मिले उसे सुख-शान्ति अरु, भक्ति का वरदान॥