Chandra Chalisa
Opening
Doha
जय-जय चंदा! श्री चन्द्रमा, जय-जय अमृत-अंशु-उजागर। जयति शशांक! कला-निधि, तुम हो नित्य सुधा-सागर॥
Chaupai
Chaupai 1
जय-जय चन्द्र! देव! हितकारी, जयति निशाकर! शुभ-उजियारी॥
Chaupai 2
तुमसे रात्रि शोभा पाती, किरण तुम्हारी मन को भाती॥
Chaupai 3
क्षीर-सिंधु से तुम उपजाए, कहे जात हो अत्रि-सुत-आए॥
Chaupai 4
विष्णु-वाम-दृग-अंश स्वरूपा, विश्व-मोद-कारक! तव रूपा॥
Chaupai 5
श्वेत-वर्ण, दस-अश्व-युक्त-रथ, विचरत नभ में सबके पथ-रथ॥
Chaupai 6
अमृत-किरणों से मन हरते, सबकी पीड़ा तुम हर लेते॥
Chaupai 7
जब तुम उदित गगन में होते, पुष्प, लता सब हर्षित होते॥
Chaupai 8
सभी जीव-जंतु सुख पाते, शीतल- मंद-पवन-लहराते॥
Chaupai 9
तुम हो सत्ताइस-नक्षत्रेश, तुम ही हो सब देव-महेश॥
Chaupai 10
तुम हो सोलह-कला-युक्त-स्वामी, घटते-बढ़ते अन्तर्यामी॥
Chaupai 11
जब-जब तुम पूरे हो जाते, विविध-उत्सव तब हैं मनाते॥
Chaupai 12
तुम पर जब राहु चढ़ आता, पूर्ण-ग्रहण जग में कहलाता॥
Chaupai 13
तुमसे ही सारे व्रत होते, तेरे बिन सब निष्फल होते॥
Chaupai 14
तुम हो औषधि-वन के स्वामी, तुम बिन व्यर्थ सभी फल-कामी॥
Chaupai 15
तुमसे वर्षा-ऋतु कहलाती, तुम्हारी कला अन्न उपजाती॥
Chaupai 16
फसलें तुमसे बल हैं पाती, धरती पर हरियाली छाती॥
Chaupai 17
तुम ही पितरों के हो प्यारे, तुमसे सब हैं भाग्य-सँवारे॥
Chaupai 18
हो मन के स्वामी तुम देवा, करते सुर-नर-मुनि सब सेवा॥
Chaupai 19
रोहिणी-प्रिय, देव! हमारे, सब संकट-विपदा को टारे॥
Chaupai 20
जो कोई जपता नाम तुम्हारा, हर लेते हो सब दुःख सारा॥
Chaupai 21
रोगी हो या कोई निर्धन, तुम हर लेते हो सब क्रंदन॥
Chaupai 22
जिस पर होवे कृपा तुम्हारी, विपदा उसे न व्यापै भारी॥
Chaupai 23
जो नर जपता चन्द्र-मंत्र को, पाता है वह सकल-सुख-तंत्र को॥
Chaupai 24
जिसकी होवे दशा तुम्हारी, उसे न कोई चिंता भारी॥
Chaupai 25
सोमवार का व्रत जो करता, उसकी तुम पीड़ा सब हरता॥
Chaupai 26
श्वेत-पुष्प, अक्षत, दधि-मेवा, करते हैं सब तुम्हारी सेवा॥
Chaupai 27
चालीसा जो पढ़े-सुनावे, सब सुख-भोग, परम-पद पावे॥
Chaupai 28
‘लखि’ दीन की सुनो कहानी, जय-जय चन्द्रदेव! सुखखानी॥
Closing
Doha
शशि-सुत! ‘बुध’ के पिता हो, हे शशि! तुम मम-त्राण। शरणागत की रक्षा करो, हे अमृत की खान॥