Mahalakshmi Chalisa
Opening
Doha
जय जय श्री महालक्ष्मी, करूँ मात तव ध्यान। सिद्ध काज मम किजिये, निज शिशु सेवक जान॥
Chaupai
Chaupai 1
नमो महा लक्ष्मी जय माता। तेरो नाम जगत विख्याता॥
Chaupai 2
आदि शक्ति हो मात भवानी। पूजत सब नर मुनि ज्ञानी॥
Chaupai 3
जगत पालिनी सब सुख करनी। निज जनहित भण्डारण भरनी॥
Chaupai 4
श्वेत कमल दल पर तव आसन। मात सुशोभित है पद्मासन॥
Chaupai 5
श्वेताम्बर अरू श्वेता भूषण। श्वेतही श्वेत सुसज्जित पुष्पन॥
Chaupai 6
शीश छत्र अति रूप विशाला। गल सोहे मुक्तन की माला॥
Chaupai 7
सुंदर सोहे कुंचित केशा। विमल नयन अरु अनुपम भेषा॥
Chaupai 8
कमलनाल समभुज तवचारि। सुरनर मुनिजनहित सुखकारी॥
Chaupai 9
अद्भूत छटा मात तव बानी। सकलविश्व कीन्हो सुखखानी॥
Chaupai 10
शांतिस्वभाव मृदुलतव भवानी। सकल विश्वकी हो सुखखानी॥
Chaupai 11
महालक्ष्मी धन्य हो माई। पंच तत्व में सृष्टि रचाई॥
Chaupai 12
जीव चराचर तुम उपजाए। पशु पक्षी नर नारी बनाए॥
Chaupai 13
क्षितितल अगणित वृक्ष जमाए। अमितरंग फल फूल सुहाए॥
Chaupai 14
छवि विलोक सुरमुनि नरनारी। करे सदा तव जय-जय कारी॥
Chaupai 15
सुरपति औ नरपत सब ध्यावैं। तेरे सम्मुख शीश नवावैं॥
Chaupai 16
चारहु वेदन तब यश गाया। महिमा अगम पार नहिं पाये॥
Chaupai 17
जापर करहु मातु तुम दाया। सोइ जग में धन्य कहाया॥
Chaupai 18
पल में राजाहि रंक बनाओ। रंक राव कर बिमल न लाओ॥
Chaupai 19
जिन घर करहु माततुम बासा। उनका यश हो विश्व प्रकाशा॥
Chaupai 20
जो ध्यावै से बहु सुख पावै। विमुख रहे हो दुख उठावै॥
Chaupai 21
महालक्ष्मी जन सुख दाई। ध्याऊं तुमको शीश नवाई॥
Chaupai 22
निज जन जानीमोहीं अपनाओ। सुखसम्पति दे दुख नसाओ॥
Chaupai 23
ॐ श्री-श्री जयसुखकी खानी। रिद्धिसिद्ध देउ मात जनजानी॥
Chaupai 24
ॐ ह्रीं-ॐ ह्रीं सब व्याधिहटाओ। जनउन विमल दृष्टिदर्शाओ॥
Chaupai 25
ॐ क्लीं-ॐ क्लीं शत्रुन क्षयकीजै। जनहित मात अभय वरदीजै॥
Chaupai 26
ॐ जयजयति जयजननी। सकल काज भक्तन के सरनी॥
Chaupai 27
ॐ नमो-नमो भवनिधि तारनी। तरणि भंवर से पार उतारनी॥
Chaupai 28
सुनहु मात यह विनय हमारी। पुरवहु आशन करहु अबारी॥
Chaupai 29
ऋणी दुखी जो तुमको ध्यावै। सो प्राणी सुख सम्पत्ति पावै॥
Chaupai 30
रोग ग्रसित जो ध्यावै कोई। ताकी निर्मल काया होई॥
Chaupai 31
विष्णु प्रिया जय-जय महारानी। महिमा अमित न जाय बखानी॥
Chaupai 32
पुत्रहीन जो ध्यान लगावै। पाये सुत अतिहि हुलसावै॥
Chaupai 33
त्राहि त्राहि शरणागत तेरी। करहु मात अब नेक न देरी॥
Chaupai 34
आवहु मात विलम्ब न कीजै। हृदय निवास भक्त बर दीजै॥
Chaupai 35
जानूं जप तप का नहिं भेवा। पार करो भवनिध वन खेवा॥
Chaupai 36
बिनवों बार-बार कर जोरी। पूरण आशा करहु अब मोरी॥
Chaupai 37
जानि दास मम संकट टारौ। सकल व्याधि से मोहिं उबारौ॥
Chaupai 38
जो तव सुरति रहै लव लाई। सो जग पावै सुयश बड़ाई॥
Chaupai 39
छायो यश तेरा संसारा। पावत शेष शम्भु नहिं पारा॥
Chaupai 40
गोविंद निशदिन शरण तिहारी। करहु पूरण अभिलाष हमारी॥
Closing
Doha
महालक्ष्मी चालीसा, पढ़ै सुनै चित लाय। ताहि पदारथ मिलै, अब कहै वेद अस गाय॥