Kamakhya Chalisa
Opening
Doha
सुमिरन कामाख्या करुँ, सकल सिद्धि की खानि। होइ प्रसन्न सत करहु माँ, जो मैं कहौं बखानि॥
Chaupai
Chaupai 1
जै जै कामाख्या महारानी। दात्री सब सुख सिद्धि भवानी॥
Chaupai 2
कामरुप है वास तुम्हारो। जहँ ते मन नहिं टरत है टारो॥
Chaupai 3
ऊँचे गिरि पर करहुँ निवासा। पुरवहु सदा भगत मन आसा॥
Chaupai 4
ऋद्धि सिद्धि तुरतै मिलि जाई। जो जन ध्यान धरै मनलाई॥
Chaupai 5
जो देवी का दर्शन चाहे। हदय बीच याही अवगाहे॥
Chaupai 6
प्रेम सहित पंडित बुलवावे। शुभ मुहूर्त निश्चित विचारवे॥
Chaupai 7
अपने गुरु से आज्ञा लेकर। यात्रा विधान करे निश्चय धर॥
Chaupai 8
पूजन गौरि गणेश करावे। नान्दीमुख भी श्राद्ध जिमावे॥
Chaupai 9
शुक्र को बाँयें व पाछे कर। गुरु अरु शुक्र उचित रहने पर॥
Chaupai 10
जब सब ग्रह होवें अनुकूला। गुरु पितु मातु आदि सब हूला॥
Chaupai 11
नौ ब्राह्मण बुलवाय जिमावे। आशीर्वाद जब उनसे पावे॥
Chaupai 12
सबहिं प्रकार शकुन शुभ होई। यात्रा तबहिं करे सुख होई॥
Chaupai 13
जो चह सिद्धि करन कछु भाई। मंत्र लेइ देवी कहँ जाई॥
Chaupai 14
आदर पूर्वक गुरु बुलावे। मन्त्र लेन हित दिन ठहरावे॥
Chaupai 15
शुभ मुहूर्त में दीक्षा लेवे। प्रसन्न होई दक्षिणा देवै॥
Chaupai 16
ॐ का नमः करे उच्चारण। मातृका न्यास करे सिर धारण॥
Chaupai 17
षडङ्ग न्यास करे सो भाई। माँ कामाक्षा धर उर लाई॥
Chaupai 18
देवी मन्त्र करे मन सुमिरन। सन्मुख मुद्रा करे प्रदर्शन॥
Chaupai 19
जिससे होई प्रसन्न भवानी। मन चाहत वर देवे आनी॥
Chaupai 20
जबहिं भगत दीक्षित होइ जाई। दान देय ऋत्विज कहँ जाई॥
Chaupai 21
विप्रबंधु भोजन करवावे। विप्र नारि कन्या जिमवावे॥
Chaupai 22
दीन अनाथ दरिद्र बुलावे। धन की कृपणता नहीं दिखावे॥
Chaupai 23
एहि विधि समझ कृतारथ होवे। गुरु मन्त्र नित जप कर सोवे॥
Chaupai 24
देवी चरण का बने पुजारी। एहि ते धरम न है कोई भारी॥
Chaupai 25
सकल ऋद्धि-सिद्धि मिल जावे। जो देवी का ध्यान लगावे॥
Chaupai 26
तू ही दुर्गा तू ही काली। माँग में सोहे मातु के लाली॥
Chaupai 27
वाक् सरस्वती विद्या गौरी। मातु के सोहैं सिर पर मौरी॥
Chaupai 28
क्षुधा, दुरत्यया, निद्रा तृष्णा। तन का रंग है मातु का कृष्णा॥
Chaupai 29
कामधेनु सुभगा और सुन्दरी। मातु अँगुलिया में है मुंदरी॥
Chaupai 30
कालरात्रि वेदगर्भा धीश्वरि। कंठमाल माता ने ले धरि॥
Chaupai 31
तृषा सती एक वीरा अक्षरा। देह तजी जानु रही नश्वरा॥
Chaupai 32
स्वरा महा श्री चण्डी। मातु न जाना जो रहे पाखण्डी॥
Chaupai 33
महामारी भारती आर्या। शिवजी की ओ रहीं भार्या॥
Chaupai 34
पद्मा, कमला, लक्ष्मी, शिवा। तेज मातु तन जैसे दिवा॥
Chaupai 35
उमा, जयी, ब्राह्मी भाषा। पुर हिं भगतन की अभिलाषा॥
Chaupai 36
रजस्वला जब रुप दिखावे। देवता सकल पर्वतहिं जावें॥
Chaupai 37
रुप गौरि धरि करहिं निवासा। जब लग होइ न तेज प्रकाशा॥
Chaupai 38
एहि ते सिद्ध पीठ कहलाई। जउन चहै जन सो होई जाई॥
Chaupai 39
जो जन यह चालीसा गावे। सब सुख भोग देवि पद पावे॥
Chaupai 40
होहिं प्रसन्न महेश भवानी। कृपा करहु निज-जन असवानी॥
Closing
Doha
कर्हे गोपाल सुमिर मन, कामाख्या सुख खानि। जग हित माँ प्रगटत भई, सके न कोऊ खानि॥